दुनिया आज ईरान और इज़राइल के बीच छिड़े भीषण संघर्ष को देख रही है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि ईरान की इस शक्तिशाली धार्मिक सत्ता की जड़ें उत्तर भारत की मिट्टी से जुड़ी हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और उनके गुरु अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी, दोनों का ही नाता उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव किंतूर से है।
1. पूर्वजों का नाता: बाराबंकी से ईरान तक का सफर
ईरान की 1979 की इस्लामी क्रांति के जनक अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के दादा, सैयद अहमद मुसावी, उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किंतूर गाँव में पैदा हुए थे।
पलायन की कहानी: 1830 के आसपास, सैयद अहमद मुसावी धार्मिक शिक्षा और यात्रा के लिए अवध के नवाब के साथ इराक गए और फिर वहां से ईरान के 'खुमैन' शहर में बस गए।
'हिंदी' उपनाम का गौरव: अहमद मुसावी को अपनी भारतीय जड़ों पर इतना गर्व था कि उन्होंने अपने नाम के साथ 'हिंदी' जोड़ा। आज भी ईरानी सरकारी दस्तावेजों में उनका उल्लेख "सैयद अहमद मुसावी हिंदी" के रूप में मिलता है।
खामेनेई और खुमैनी का रिश्ता: अयातुल्ला अली खामेनेई, रुहोल्लाह खुमैनी के सबसे भरोसेमंद शिष्य थे। हालांकि खामेनेई का जन्म ईरान में हुआ, लेकिन उनकी आध्यात्मिक वंशावली और वैचारिक जड़ें उसी 'मुसावी' परिवार से जुड़ी हैं जिसने भारत की मिट्टी से अपनी पहचान बनाई।
2. जब 1980 में भारत आए थे अली खामेनेई
सर्वोच्च नेता बनने से पहले, अयातुल्ला अली खामेनेई ने 1980-81 में भारत का दौरा किया था। उस समय वह एक उभरते हुए धर्मगुरु थे।
बेंगलुरु और अलीपुर यात्रा: खामेनेई कर्नाटक के अलीपुर (बेंगलुरु के पास) गए थे, जिसे 'छोटा ईरान' भी कहा जाता है। वहां उन्होंने ईरान के सहयोग से बने एक अस्पताल का उद्घाटन भी किया था।
कश्मीर में संबोधन: उन्होंने श्रीनगर का भी दौरा किया और वहां एक सुन्नी मस्जिद में नमाज पढ़ी। उनका वह भाषण शिया-सुन्नी भाईचारे के लिए मिसाल माना जाता है, जिससे घाटी में उस समय का सांप्रदायिक तनाव काफी कम हुआ था।
3. भारत-ईरान संबंध: कूटनीति और विवाद
खामेनेई के कार्यकाल में भारत और ईरान के रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं।
साझा विरासत और व्यापार: चाबहार पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स ने दोनों देशों को रणनीतिक रूप से जोड़ा है। भारत के शिया समुदाय के लिए खामेनेई एक बड़े धार्मिक मार्गदर्शक (मरजा) रहे हैं।
ताजा विवाद (2024-25): पिछले कुछ समय में खामेनेई के भारतीय मुसलमानों पर दिए गए बयानों ने विवाद पैदा किया। भारत सरकार ने हमेशा इसका कड़ा विरोध किया और इसे "आंतरिक मामलों में दखल" करार दिया। जानकारों का मानना है कि अमेरिका के दबाव में भारत द्वारा ईरान से तेल न खरीदना इस नाराजगी की एक बड़ी वजह रही।
4. वर्तमान परिदृश्य: एक युग का अंत?
मार्च 2026 में अमेरिका और इज़राइल द्वारा किए गए हालिया हमलों और खामेनेई की शहादत की खबरों के बाद, उत्तर प्रदेश का किंतूर गाँव शोक में डूबा है। वहां के निवासी आज भी उन्हें अपने 'परिवार का हिस्सा' मानते हैं।
मुख्य तथ्य (Quick Facts):
| विवरण | जानकारी |
| पुश्तैनी गाँव | किंतूर, जिला बाराबंकी, उत्तर प्रदेश। |
| पूर्वज | सैयद अहमद मुसावी हिंदी (परदादा के स्तर पर संबंध)। |
| भारत यात्रा | 1980-81 (बेंगलुरु और कश्मीर)। |
| विचारधारा | विलायत-ए-फकीह (इस्लामी न्यायविद् का शासन)। |
निष्कर्ष: बाराबंकी की गलियों से शुरू हुई एक रूहानी यात्रा ने ईरान जैसे शक्तिशाली राष्ट्र का भाग्य बदल दिया। अयातुल्ला अली खामेनेई का इतिहास हमें याद दिलाता है कि वैश्विक राजनीति और भूगोल चाहे कितना भी बदल जाए, इतिहास के धागे अक्सर सरहदों के पार जाकर एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
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