*अध्याय १* 🌸 मोह ही सारे तनाव व विषादों का कारण होता है। *अध्याय २* 🌸 शरीर नहीं आत्मा को मैं समझो और आत्मा अजन्मा-अमर है। *अध्याय ३* 🌸 कर्तापन और कर्मफल के विचार को ही छोड़ना है, कर्म को कभी नहीं। *अध्याय ४* 🌸 सारे कर्मों को ईश्वर को अर्पण करके करना ही कर्म संन्यास है। *अध्याय ५* 🌸 मैं कर्ता हूँ- यह भाव ही अहंकार है, जिसे त्यागना और सम रहना ही ज्ञान मार्ग है। *अध्याय ६* 🌸 आत्मसंयम के बिना मन को नहीं जीता जा सकता, बिना मन जीते योग नहीं हो सकता। *अध्याय ७* 🌸 त्रिकालज्ञ ईश्वर को जानना ही भक्ति का कारण होना चाहिये, यही ज्ञानयोग है। *अध्याय ८* 🌸 ईश्वर ही ज्ञान और ज्ञेय हैं- ज्ञेय को ध्येय बनाना योगमार्ग का द्वार है । *अध्याय ९* 🌸 जीव का लक्ष्य स्वर्ग नहीं ईश्वर से मिलन होना चाहिये । *अध्याय १०* 🌸 परम कृपालु सर्वोत्तम नहीं बल्कि अद्वितीय हैं। *अध्याय ११* 🌸 यह विश्व भी ईश्वर का स्वरूप है, चिन्ताएँ मिटाने का प्रभुचिन्तन ही उपाय है। *अध्याय १२* 🌸 अनन्यता और बिना पूर्ण समर्पण भक्ति नहीं हो सकती और बिना भक्ति भगवान् नहीं मिल सकते। *अध्याय १३* 🌸 हर तन में जीवात्मा परमात्मा...
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